दमोह संसदीय क्षेत्र में लोधी समाज की जागरूकता और विधानसभा चुनाव नतीजों ने.. भाजपा और सांसद प्रहलाद पटेल के लिए खतरे की घंटी बजाई..

भाजपा की तरह कांग्रेस की नजर भी अब लोधी प्रत्याशी पर-

दमोह। मप्र में विधानसभा चुनाव के नतीजे 15 साल से सत्तारूढ़ भाजपा नेताओ की मंशा के अनुरूप नहीं आने के बावजूद भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व का पूरा ध्यान अब लोकसभा चुनाव पर है। यही वजह है कि प्रदेश में जोड़-तोड़ की राजनीति करने के बजाय लोकसभा चुनाव के गुणा भाग पर ध्यान देने के निर्देश भाजपा हाईकमान ने प्रदेश संगठन को दिए है।

5 माह बाद होने वाले लोकसभा चुनाव के परिदृश्य पर यदि नजर डालें तो हाल ही में हुए विधानसभा चुनाव ने काफी कुछ तस्वीर स्पष्ट कर दी है। कांग्रेस अपने चुनावी वायदों को पूरा करने वचन पत्र में दर्शाए गए संकल्पों को लेकर घोषणाएं करने में लगी हुई है। मुख्यमंत्री कमलनाथ किसानों की कर्ज माफी से लेकर अन्य घोषणाएं करके लोकसभा चुनाव तक प्रदेश की जनता को कांग्रेस से जोड़े रखने कृत संकल्पित नजर आ रहे हैं। वहीं सत्ता में रहकर विपक्षी धार खो बैठे भाजपाइयों के लिए अब विरोध की राजनीति भी रास नहीं आ रही है। राफेल को लेकर हुए भाजपा के धरना प्रदर्शन मैं साफ तौर पर नजर आया है कि भाजपा नेताओ में अब पहले जैसे विरोध करने जैसी क्षमता नहीं बची है। विधानसभा चुनाव परिणामों के बाद दमोह संसदीय क्षेत्र में मजबूती के साथ उभर कर सामने आए जातिवादी गणित और लोधी समाज के चार युवा प्रत्याशियों की जीत ने आगामी लोकसभा चुनाव के लिए भाजपा के बाद कांग्रेस से भी लोधी समाज के ही युवा साफ-सुथरे चेहरे के लिए जमीन तैयार कर दी है।


दमोह से 35 साल के राहुल सिंह लोधी ने लगातार 28 साल से विधायक और 15 साल से भाजपा की प्रदेश सरकारो में कैबिनेट मंत्री रहे जयंत मलैया को हराकर चौंकाने वाली जीत दर्ज की है। इधर राहुल के चचेरे भाई प्रदुमन सिंह लोधी ने बड़ा मलहरा क्षेत्र से कांग्रेस प्रत्याशी घोषित होने के बाद राज्य मंत्री ललिता यादव को 15000 से अधिक के बड़े अंतर से करारी मात दी है। इधर बंडा क्षेत्र से पहली बार कांग्रेस प्रत्याशी बनाए गए तरवर सिंह लोधी ने भाजपा विधायक रहे और पूर्व मंत्री हरनाम सिंह राठौर के बेटे हरवंश सिंह को भी करारी मात देकर सभी को चौंका दिया है। लोधी समाज के इन तीन युवा चेहरों की भाजपा प्रत्याशियों पर चमकदार जीत के साथ दमोह संसदीय क्षेत्र में कांग्रेस के 3 विधायकों की संख्या में इजाफा हुआ है।

  इधर भाजपा ने जो इकलौती सीट कांग्रेस से जीती है वहा भी लोधी समाज के ही युवा चेहरे धर्मेंद्र सिंह लोधी ने अपनी चमक बिखेरी है। कांग्रेस नेता और विधायक प्रताप सिंह लोधी एवं भाजपा के बागी राघवेंद्र सिंह ऋषि लोधी को मात देने वाले धर्मेंद्र लोधी से अधिक सांसद प्रहलाद पटेल की प्रतिष्ठा यहां पर दांव पर लगी थी। क्योंकि उन्होंने ही भाजपा के प्रदेश मंत्री ऋषि लोधी की टिकट कटवा कर धर्मेंद्र को प्रत्याशी घोषित कराया था।

विधानसभा चुनाव के बाद दमोह लोकसभा क्षेत्र में वोटों के जोड़ घटाना- दमोह, सागर और छतरपुर जिले के 8 विधान सभा क्षेत्रों को मिलाकर बनाए गए दमोह संसदीय क्षेत्र में पिछली बार भाजपा के पास 6 विधायक थे। जो इस बार घट कर तीन ही बचे है। वहीं कांग्रेस के विधायकों की संख्या दो से बढ़ कर चार हो गई है। इधर बसपा ने भी पहली बार संसदीय क्षेत्र में अपना खाता खोलने में सफलता दर्ज की है।  2014 में जब पूर्व केंद्रीय मंत्री प्रहलाद पटेल लोकसभा चुनाव लड़ने दमोह संसदीय क्षेत्र में आए थे उस समय यहां के 8 में से 6 विधान सभा क्षेत्रों पर भाजपा का कब्जा था। मात्र देवरी और जबेरा सीट ही कांग्रेस के पास थी। लेकिन 2018 के चुनाव में परिदृश्य पूरी तरह से बदल गया है। सांसद पटेल के प्रयासों से भाजपा ने जबेरा सीट कांग्रेस से छीन ली है। लेकिन बदले में कांग्रेसी से पहली बार विधानसभा का चुनाव लड़ने वाले सांसद प्रहलाद के तीन सजातीय बंधुओं ने भाजपा का दमोह, बंडा और बड़ा मलहरा सीट से एकाधिकार खत्म कर दिया है।

इतनी सब राम कहानी लिखने का आशय यही है कि दमोह संसदीय क्षेत्र में लोधी समाज के लोगों ने सजातीय युवा चेहरों को चुनकर विधायक बनाने में जिस तरह से एकजुटता दिखाकर समाज की वोटों के नाम पर राजनीति करने वाले बड़े पुराने नेताओं को किनारे लगा दिया है। जबेरा से कांग्रेस नेता और विधायक रहे प्रताप सिंह तथा भाजपा के प्रदेश मंत्री ऋषि लोधी की हार इस बात का सबसे बड़ा उदाहरण है। क्या इसी तरह की हालात अब लोकसभा में भी बन सकते हैं तथा सांसद प्रहलाद पटेल की जीत हार का गणित लोधी समाज के लोग ही बिगाड़ सकते हैं इसको लेकर भी अभी से जोड़ घटाना शुरू हो गया है। कांग्रेस यदि लोधी समाज के इसी साफ-सुथरे युवा चेहरे को दमोह संसदीय क्षेत्र से अपना प्रत्याशी घोषित करती है तो भाजपा नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री सांसद प्रहलाद पटेल को अपनी सीट बचाना मुश्किल होगा। 

 2014 के पिछले लोकसभा चुनाव में प्रहलाद पटेल ने मोदी लहर में कांग्रेस के महेंद्र प्रताप सिंह जो कि कुर्मी समाज से तालुकात रखते थे को 2 लाख 13 हजार 299 वोटों के बड़े अंतर से मात दी थी। लेकिन 2019 के लोकसभा चुनाव के पहले 11 दिसंबर 2018 को आए विधानसभा चुनाव के परिणामों में भाजपा की जीत का अंतर घटकर मात्र 15 हजार 121 वोट ही बचा है। लाखों से घटकर वोटों का अंतर हजारों पर आ जाने की बजह भाजपा की वोटों में गिरावट की बजाए कांग्रेस की वोटों में जबरदस्त वृद्धि रही है। दरअसल 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा प्रत्याशी प्रहलाद पटेल को संसदीय क्षेत्र के आठो विधानसभा से 5 लाख 13 हजार 91 वोट प्राप्त हुए थे। जबकि 2019 के लोकसभा चुनाव के पहले हाल ही में हुए विधान सभा चुनाव में आठों क्षेत्रों से भाजपा प्रत्याशियों को मिले वोटों का कुल टोटल 5 लाख 11 हजार 951 रहा है। जो पिछली बार से महज 1120 वोट कम है। लेकिन कांग्रेस के वोट बैंक में जबरदस्त  वृद्धि हुई है। कांग्रेस ने पिछली बार मिले 2 लाख 99 हजार 780 वोट के आंकड़े में लगभग दो लाख मतो का इजाफा करके विधानसभा चुनाव में 4 लाख 96 हजार 831 तक पहुचा दिया है।

जबकि इस बार के विधानसभा मैं अनेक क्षेत्रों में कांग्रेस के बागी प्रत्याशियों ने भी पार्टी को काफी नुकसान पहुंचाते हुए अच्छे खासे बहुत कबाड़े हैं।  वोटों के गुणा भाग की यह तस्वीर 5 माह बाद होने वाले लोकसभा चुनाव के दौरान भी भाजपा कांग्रेस को मिलने वाले मतों को लेकर लगभग ऐसी ही रह सकती है। यदि कांग्रेस ने किसी साफ-सुथरी छवि के लोधी युवा को दमोह संसदीय क्षेत्र से अपना प्रत्याशी घोषित कर दिया तो वह भाजपा के पुराने लोधी चेहरे प्रहलाद पटेल मुश्किल में डाल सकते हैं। जबेरा क्षेत्र में कांग्रेस विधायक प्रताप सिंह लोधी को भाजपा के नए युवा चेहरे धर्मेंद्र सिंह लोधी द्वारा मात देने का उदाहरण सामने है।

 वैसे भी इस वार सांसद प्रहलाद पटेल की राह में भाजपा से विधानसभा चुनाव हारने वाले प्रत्याशी तथा उनके समर्थक कांटे ही बिछाएंगे। रहली गढ़ाकोटा क्षेत्र से लगातार 9 वी जीत दर्ज करने वाले गोपाल भार्गव तथा उनके समर्थक तथा भाजपा से बगावत करने वाले बाबा रामकृष्ण कुसमरिया भी अब वैसी मदद नही कर पाएंगे। इनके अलावा जबेरा से भाजपा के बागी राघवेंद्र सिंह ऋषि लोधी और उनके समर्थको ने तो अभी से विरोध का शंखनाद शुरू कर दिया है। ऐसे में देखना होगा कि सांसद पटेल किस नई रणनीति के साथ दमोह लोकसभा क्षेत्र से चुनाव मैदान में ताल ठोकते हैं। या फिर किसी नए संसदीय क्षेत्र से चुनाव मैदान में उतरते है। अटल राजेंद्र जैन की रिपोर्ट

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